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‘बाल संस्कार’ पुस्तक से….

मेरा नाम ऐशवर्य तिवारी है। मैं कक्षा चार का छात्र हूँ। मेरी माँ पूज्य बापू जी द्वारा दीक्षित है। उसने मुझे आश्रम से प्रकाशित पुस्तक बाल संस्कार पढ़ने को दी। उसमें लिखे प्रयोग करने से मेरी स्मरणशक्ति बढ़ी है। पहले मैंने पहली कक्षा में 78 % , दूसरी में 80 % अंक प्राप्त किये थे, परंतु अब गुरुदेव की कृपा से तीसरी कक्षा में 90 % अंक प्राप्त किये।

ऐश्वर्य तिवारी
ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2003, पृष्ठ संख्या 29, अंक 131

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ब्लड कैंसर गायब !

हमारे मित्र की लड़की मुंबई में 9वीं कक्षा में पढ़ती थी। 2001 अप्रैल में उसे ब्लड कैंसर हो गया था। गरीब घर की इकलौती लड़की…. तभी बापू जी ने सोनी चैनल पर अपने सत्संग में तुलसी रस व शहद की चमत्कारिक दवा बतायी। हमने तुरंत उसकी माँ को फोन करके यह दवा बता दी। उन्होंने उसी दिन से तुलसी का रस और शहद एवं ज्वारे का रस देना शुरु कर दिया और कुछ ही दिनों में वह ठीक हो गयी। अब वह एकदम स्वस्थ है एवं खेलकूद में उसने पूरे भारत में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है।

कैसी है बापू जी की कृपा !

आशा वर्मा
504, आनंद विहार, मुंबई (महाराष्ट्र)
ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 30, अंक 122, फरवरी 2003.

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ब्लड कैंसर से मुक्ति

जनवरी 2002 में मेरे बड़े पुत्र को बुखार आया था। डॉक्टरों को दिखाया था तो किसी ने मलेरिया कहकर दवाइयाँ दीं तो किसी ने टायफाईड कहकर इलाज शुरु किया। दवा लेने से शरीर नीला पड़ गया और सूज गया। शरीर में खून की कमी होने से छः बोतलें खून चढ़ाया गया। इंजेक्शन देने से पूरे शरीर को लकवा मार गया। पीठ और पेट का एक्स रे लिया गया। डॉक्टरों ने उसे वायु का बुखार तथा रक्त का कैंसर बताया और कहा कि उसके हृदय का वाल्व चौड़ा हो गया है। ज्यों-ज्यों इलाज किये, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ा दिया। यह है अंग्रेजी दवाओं और इंजेक्शनों का काला मुँह ! फिर भी हम चेतते नहीं। अब हम हिम्मत हार गये। गुरु जी के सिवाय कोई सहारा नहीं था। हमने पूज्य श्री की कुटिया की परिक्रमा की एवं श्री आसारामायण का पाठ किया। गुरुजी की करुणा-कृपा बरसी और 18 दिनों में ही मेरा पुत्र चलने फिरने लगा। अब वह पूर्णतया ठीक हो चुका है। मैं उन महापुरुष की जीवनगाथा को बार-बार नमन करता हूँ,जिसके श्रद्धा-संयुक्त पाठ से मेरे पुत्र को जीवनदान मिल सका और भक्त भाइयों से प्रार्थना करता हूँ कि वे नित्य इसका मंगलमय पाठ किया करें।

एन.डी.चावला
प्रसिद्ध उद्योगपति
सेक्टर 35, चण्डीगढ़

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ 30, अंक 133, जनवरी 2004

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भूले भटकों को दिखाये राहः ‘ऋषि प्रसाद’

मैं ऋषि प्रसाद का सदस्य हूँ। इस पत्रिका का सदस्य बनने से पहले मेरा जीवन बड़ा घृणित था।बुरी संगत में आकर मैंने अपना यौवनरूपी धन व्यर्थ बहा दिया। इसमें केवल मेरा ही दोष नहीं है बल्कि आज का प्रदूषित वातावरण ही ऐसा है कि जिसमें युवावर्ग अक्सर भटक जाता है। युवावर्ग को उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। ऋषि प्रसाद में आने वाले ‘युवा जागृति संदेश’ शीर्षक लेख से प्रभावित होकर मैंने ब्रह्मचर्य पालन करने का निर्णय ले लिया है। अब मैं प्रतिदिन सुबह-शाम रामनाम जपता हूँ। आपके द्वारा प्रकाशित ऋषि प्रसाद पत्रिका देश में असंख्य भूले भटके व्यक्तियों को सही रास्ते पर लाने का कार्य सरलता से करती है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है।

विजय ‘स्टार’, रणवां की ढाणी, चूरू (राजस्थान)

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 31, सितम्बर 2002, अंक 117

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मंत्रजप से मृत्यु के मुँह से बाहर

18 अक्तूबर 2006 को मेरी माँ लक्ष्मीबाई सिद्धप्पा हट्टी, उम्र 50 वर्ष के पेट में दर्द होने लगा। हम उन्हें अस्पताल में ले गये। आँतों में छेद हुआ है इसलिए शीघ्र ऑपरेशन की आवश्यकता बताकर डॉक्टरों ने दो लाख रूपये जमा करने के लिए कहा। दो घंटे ऑपरेशन चला। ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक माँ होश में नहीं आयीं। उन्हें कृत्रिम श्वसन तंत्र लगाया गया था। जब दस दिन तक माँ होश में नहीं आयीं, तब कई बार पूछने पर डॉक्टरों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए बतायाः ‘आपरेशन के समय अनेस्थेशिया (बेहोशी की दवा) अधिक देने के कारण मरीज कोमा में चला गया है।’हम माँ को दूसरे डॉक्टर के पास ले गये, जिन्होंने माँ का सी.टी. स्कैन करने के बाद बताया, कि अब कुछ नहीं हो सकता। दोनों जगह से निराश होकर मरता क्या नहीं करता – हम माँ को घर ले आये और अमदावाद आरोग्य केन्द्र से संपर्क किया। उन्होंने हमें सिर पर तिल के तेल से मालिश करते हुए कोमा से बाहर लाने वाला खास मंत्र जपने के लिए दिया। मंत्र का प्रतिदिन एक घंटा जप करने की व हाथ पैरों के तलुओं में सरसों के तेल से मालिश करने की सलाह दी। विधिवत् मालिश एवं जप शुरू करने के एक घंटे के बाद ही माँ कोमा से बाहर आ गयीं। छठे दिन से वे बोलने लगीं व दसवें दिन से उन्होंने अन्न सेवन शुरू कर दिया। अब उनका मस्तिष्क पूर्णतः स्वस्थ है। अब वहाँ के डॉक्टर कहते हैं कि यह एक चमत्कार है। यह सब तो पूज्य गुरू देव की असीम कृपा का फल है।

श्री अरूण सिद्धप्पा हट्टी,
बेलगाँव, कर्नाटक
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2007, पृष्ठ संख्या 27, अंक 172

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मंत्रदीक्षा के सुन्दर परिणाम

बीज गणित के दो नये सूत्र खोजे-

मैंने पूज्य बापू जी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा ली है। मैं ‘लैंसर्स सीनियर सैकेण्डरी विद्यालय, सिकंदराबाद, जिला बुलन्दशहर’ का छात्र हूँ। पूज्य बापू जी हमारे विद्यालय को दो बार अपने चरण कमलों से पवित्र कर चुके हैं। हमारी प्रधानाचार्या भी बापू जी की शिष्या हैं और पूज्य बापू जी के द्वारा दिये गये दिव्य संस्कारों से हम बच्चों को पोषित करती रहती हैं। पूज्य बापू जी के आशीर्वाद और माँ के प्रोत्साहन से गणित में कमजोर होते हुए भी मैंने खोज प्रारम्भ की और सफल हुआ। अखबार वालों ने भी इस खोज की प्रशंसा की। अगर पूज्य सदगुरुदेव का सत्संग, दीक्षा व आशीर्वाद न मिलता तो यह सफलता सम्भव न थी।

a2+b2 = (a+b)(a+b-2ab) when a ≠ -b
a+b
a2+b2 = (a-b)(a-b+2ab) when a ≠ b
a-b
पूज्य बापू जी की कृपा से उपरोक्त दो सूत्रों को ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ द्वारा प्रमाणपत्र मिल चुका है और अन्य चार सूत्रों पर कार्य कर रहा है। मुझे उम्मीद है कि गुरुदेव की कृपा से आगे भी सफलता जरूर मिलेगी।

अनमोल गर्ग
बिलासपुर, जिला गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश)
ऋषि प्रसाद, जुलाई 2006, पृष्ठ संख्या 31, अंक 163

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मंत्रदीक्षा व ध्यान के प्रभाव से सफलताएँ

मैंने वर्ष 2002 में पूज्य बापू जी से सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा ली और उसी वर्ष एम. कॉम.(फर्स्ट ईयर) की परीक्षा में 80.5 % अंक प्राप्त किये, तत्पश्चात् प्रतिष्ठित एपीजे इंस्टीच्यूट,ग्रेटर नोयडा, से एम.बी.ए. की डिग्री से प्रथम श्रेणीसहित प्राप्त की। यह बापू जी की कृपा एवं सारस्वत्य मंत्र से उत्पन्न एकाग्रता का परिणाम ही था कि ट्रैनी बैंक अधिकारी का पदभार संभालते हुए, समय के अति अभाव के बावजूद भी मैंने एक प्राइवेट छात्र के रूप में एम. कॉम. ( फाइनल ) की परीक्षा 70 % अंकों से उत्तीर्ण की, साथ ही फ्लाइंग ऑफिसर पद की आल इंडिया स्तर की प्रतियोगी परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। नवम्बर 2006 में वायुसेना सिलेक्शन बोर्ड, बनारस द्वारा ली गयी विभिन्न परीक्षाओं एवं कठिन साक्षात्कार परीक्षा में भी मैंने मंत्रदीक्षा एवं पूज्य बापूजी के ध्यान के अदभुत प्रभाव से लाखों परीक्षार्थियों में से छँटकर करीब 300 प्रतियोगियों और उनमें से भी कुल छः चयनित उम्मीदवारों में स्थान पाने में सफलता प्राप्त की। समस्त सिलेक्शन बोर्डों द्वारा चयनित समस्त उम्मीदवारों की अंतिम रूप से बनी मेरिट सूची में भी स्थान प्राप्त कर मैंने वायुसेना एकेडमी ज्वाइन की और फ्लाइंग ऑफिसर का पद प्राप्त किया। मैंने बापू जी से मन ही मन प्रार्थना की कि, ‘हे बापू जी ! मेरी नियुक्ति ऐसे स्थान पर हो जाय जहाँ आपका आश्रम हो तथा सत्संग-लाभ मिलता रहे।’ और बापू जी की अपार कृपा का ही यह परिणाम है कि
आज मैं बड़ौदा एयर फोर्स स्टेशन पर नियुक्त हूँ। यहाँ पर मैं ही नहीं, मेरे माता-पिता जी भी आकर पूज्य बापू जी का दर्शन सत्संग लाभ प्राप्त करते हैं। उल्लेखनीय होगा कि मेरे साथ बड़ी दीदी डॉ. अनुपमा सिंह ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने से पूर्व तथा छोटा भाई कुँवर अभिषेक सिंह, जो कि अब मैनेजर है, ने लंदन (इंग्लैंड) से आकर बापूजी से दीक्षा ग्रहण की। हम सभी बापू जी के साधक के रूप में संतुष्ट हैं, खुश हैं। पूजनीय बापू जी से आगे भी
प्रार्थना है कि मेरी बापू जी के श्रीचरणों में श्रद्धा भक्ति तथा सेवा भावना बनी रहे।

अनुराधा सिंह
फ्लाइंग ऑफिसर, बड़ौदा (गुजरात)
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2009, अंक 193, पृष्ठ संख्या 29

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