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ब्लड कैंसर गायब !

हमारे मित्र की लड़की मुंबई में 9वीं कक्षा में पढ़ती थी। 2001 अप्रैल में उसे ब्लड कैंसर हो गया था। गरीब घर की इकलौती लड़की…. तभी बापू जी ने सोनी चैनल पर अपने सत्संग में तुलसी रस व शहद की चमत्कारिक दवा बतायी। हमने तुरंत उसकी माँ को फोन करके यह दवा बता दी। उन्होंने उसी दिन से तुलसी का रस और शहद एवं ज्वारे का रस देना शुरु कर दिया और कुछ ही दिनों में वह ठीक हो गयी। अब वह एकदम स्वस्थ है एवं खेलकूद में उसने पूरे भारत में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है।

कैसी है बापू जी की कृपा !

आशा वर्मा
504, आनंद विहार, मुंबई (महाराष्ट्र)
ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 30, अंक 122, फरवरी 2003.

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ब्लड कैंसर से मुक्ति

जनवरी 2002 में मेरे बड़े पुत्र को बुखार आया था। डॉक्टरों को दिखाया था तो किसी ने मलेरिया कहकर दवाइयाँ दीं तो किसी ने टायफाईड कहकर इलाज शुरु किया। दवा लेने से शरीर नीला पड़ गया और सूज गया। शरीर में खून की कमी होने से छः बोतलें खून चढ़ाया गया। इंजेक्शन देने से पूरे शरीर को लकवा मार गया। पीठ और पेट का एक्स रे लिया गया। डॉक्टरों ने उसे वायु का बुखार तथा रक्त का कैंसर बताया और कहा कि उसके हृदय का वाल्व चौड़ा हो गया है। ज्यों-ज्यों इलाज किये, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ा दिया। यह है अंग्रेजी दवाओं और इंजेक्शनों का काला मुँह ! फिर भी हम चेतते नहीं। अब हम हिम्मत हार गये। गुरु जी के सिवाय कोई सहारा नहीं था। हमने पूज्य श्री की कुटिया की परिक्रमा की एवं श्री आसारामायण का पाठ किया। गुरुजी की करुणा-कृपा बरसी और 18 दिनों में ही मेरा पुत्र चलने फिरने लगा। अब वह पूर्णतया ठीक हो चुका है। मैं उन महापुरुष की जीवनगाथा को बार-बार नमन करता हूँ,जिसके श्रद्धा-संयुक्त पाठ से मेरे पुत्र को जीवनदान मिल सका और भक्त भाइयों से प्रार्थना करता हूँ कि वे नित्य इसका मंगलमय पाठ किया करें।

एन.डी.चावला
प्रसिद्ध उद्योगपति
सेक्टर 35, चण्डीगढ़

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ 30, अंक 133, जनवरी 2004

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मंत्रजप से मृत्यु के मुँह से बाहर

18 अक्तूबर 2006 को मेरी माँ लक्ष्मीबाई सिद्धप्पा हट्टी, उम्र 50 वर्ष के पेट में दर्द होने लगा। हम उन्हें अस्पताल में ले गये। आँतों में छेद हुआ है इसलिए शीघ्र ऑपरेशन की आवश्यकता बताकर डॉक्टरों ने दो लाख रूपये जमा करने के लिए कहा। दो घंटे ऑपरेशन चला। ऑपरेशन के बाद लंबे समय तक माँ होश में नहीं आयीं। उन्हें कृत्रिम श्वसन तंत्र लगाया गया था। जब दस दिन तक माँ होश में नहीं आयीं, तब कई बार पूछने पर डॉक्टरों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए बतायाः ‘आपरेशन के समय अनेस्थेशिया (बेहोशी की दवा) अधिक देने के कारण मरीज कोमा में चला गया है।’हम माँ को दूसरे डॉक्टर के पास ले गये, जिन्होंने माँ का सी.टी. स्कैन करने के बाद बताया, कि अब कुछ नहीं हो सकता। दोनों जगह से निराश होकर मरता क्या नहीं करता – हम माँ को घर ले आये और अमदावाद आरोग्य केन्द्र से संपर्क किया। उन्होंने हमें सिर पर तिल के तेल से मालिश करते हुए कोमा से बाहर लाने वाला खास मंत्र जपने के लिए दिया। मंत्र का प्रतिदिन एक घंटा जप करने की व हाथ पैरों के तलुओं में सरसों के तेल से मालिश करने की सलाह दी। विधिवत् मालिश एवं जप शुरू करने के एक घंटे के बाद ही माँ कोमा से बाहर आ गयीं। छठे दिन से वे बोलने लगीं व दसवें दिन से उन्होंने अन्न सेवन शुरू कर दिया। अब उनका मस्तिष्क पूर्णतः स्वस्थ है। अब वहाँ के डॉक्टर कहते हैं कि यह एक चमत्कार है। यह सब तो पूज्य गुरू देव की असीम कृपा का फल है।

श्री अरूण सिद्धप्पा हट्टी,
बेलगाँव, कर्नाटक
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2007, पृष्ठ संख्या 27, अंक 172

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मंत्रदीक्षा से बदली जीवन की दिशा !

कौन कहता है कि सच्चे सदगुरु से ली गयी मंत्रदीक्षा जिन्दगी की दिशा नहीं बदलती ? मेरा नाम डॉ. जौहरी लाल है। मैं जालन्धर की बस्ती बावा खेल में क्लीनिक चलाता हूँ। जब मैंने गुरुदेव से दीक्षा नहीं ली थी तो मरीज को अस्पताल भेजने के बदले मुझे कमीशन मिलता था वह इस तरह हैः

हार्ट ऑपरेशन – 25000 रुपये
एम.आर.आई.– 2000 रुपये
सी.टी.स्केन – 800 रुपये
अल्ट्रा साउंड – 200 रुपये

इसके अलावा लैबोरेटरी के जितने भी जाँच हैं उनका 50 % क्लीनिक में दे जाते थे। 27 सितम्बर 1997 को परम पूज्य बापू जी से मंत्रदीक्षा लेने के बाद जीवन की दिशा ही बदल गयी। सितम्बर 2001 से पूनम व्रत लेने से जिन्दगी में खान-पान, रहन-सहन में और भी निखार आया। अब किसी मरीज को मैं किसी अस्पताल में भेजता हूँ तो उसकी पर्ची पर पहले ही 50 % लैस करके लिख देता हूँ। साथ में मरीज को भी बता देता हूँ कि इतने ही पैसे देना। गुरुकृपा से मैं ओ.पी.डी. में प्रतिदिन 150 से 200 मरीज देख लेता हूँ। जब कमीशन लेता था तो मन में अजीब सी चुभन होती थी लेकिन अब पाप जोर नहीं मारते। गरीब मरीज की सहायता करके विशेष आनन्द का अनुभव होता है। यह सब सदगुरु की कृपा से ही संभव है। यह मंत्रदीक्षा का असर है।
मैं परम पूज्य बापू जी को कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने मुझे जीवन जीने का सच्चा मार्ग दिखाया।

डॉ. जौहरी लाल, जालन्धर
ऋषि प्रसाद, अंक 165, सितम्बर 2006, पृष्ठ संख्या 31

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मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं…..

मेरे पुत्र दिव्येश कुमार (उम्र 16 वर्ष) को बचपन से कुछ सुनायी नहीं देता था। कई एलोपैथिक दवाइयाँ की परंतु कुछ भी लाभ नहीं हुआ। मुझे कुछ साधकों द्वारा पता चला कि गुरुदेव ने ओंजल आश्रम के बड़ बादशाह पर शक्तिपात करते समय कहा था कि इस बड़ बादशाह (कल्पवृक्ष) की जटाओं का रस कान में डालने से बहरापन मिट जायेगा। संतों के प्रति श्रद्धा-भक्ति से युक्त होकर उनके वचनों में दृढ़तापूर्वक विश्वास किया जाय तो प्रकृति भी सेवा करने को राजी हो जाती है, इसका मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया। मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं….
अर्थात् ब्रह्मनिष्ठ सदगुरूदेव के श्रीमुख से उच्चारित वाक्य मंत्र के समान होते हैं – यह जो शास्त्र वचन हैं, वह परम सत्य है, बस आपमें गुरू-वाक्य के प्रति दृढ़ श्रद्धा होनी चाहिए। हमने बड़ बादशाह की जटाओं का रस दिव्येश के कानों में डाला। बचपन से कुछ न सुन पाने वाले मेरे बेटे ने जब पहली आवाज सुनी तो वह हर्ष से गदगद हो गया। हमारे पूरे परिवार का हृदय पूज्य बापू जी के प्रति अहोभाव से भर गया। सबके दुःख हर लेने वाले निःस्वार्थ हितैषी भगवत्स्वरूप गुरूदेव को मेरे कोटि-कोटि प्रणाम !

धनजीभाई पटेल
भिनार, जिला. नवसारी (गुजरात)
स्रोतः ऋषि प्रसाद, अंक 198, जून 2009, पृष्ठ संख्या 30

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‘मामरा बादाम मिश्रण’ का चमत्कारिक प्रभाव

मैं आज यह जानकर अत्यंत हर्ष का अनुभव कर रही हूँ कि मेरे चश्मे का नं + 4 से घटकर – 2 हो गया है। मैं इस चमत्कार का पूर्ण श्रेय निःसंदेह ‘श्री योग वेदांत सेवा समिति’ द्वारा निर्मित ‘मामरा बादाम मिश्रण’ को दूँगी। 1997 में ‘के.जी.एम.सी.’ के डॉक्टरों ने मेरी आँखों का परीक्षण कर पूरे विश्वास के साथ कह दिया था कि “जीन्स का असर होने के कारण आपके चश्मे का नंबर घटने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। बस, चश्मे का नंबर यही रहे, बढ़े नहीं तो भी आप समझियेगा कि आप पर बड़ी कृपा है।” परंतु गत दो महीने पूर्व एक साधक श्री राम आशीष जी ने मुझे ‘मामरा बादाम मिश्रण’ के नियमित सेवन का परामर्श दिया। उनका परामर्श मानते हुए मैंने इसका प्रतिदिन 10 ग्राम की मात्रा में दो महीने तक सेवन किया। इसके फलस्वरूप मेरे चश्मे के नंबर में आश्चर्यजनक कमी हुई।
बापू जी के चरणकमलों में शत-शत नमन।

अपर्णा तिवारी, 567/162, आनंद नगर, बरदा रोड, लखनऊ
ऋषि प्रसाद, जनवरी 2005, अंक 145, पृष्ठ संख्या 31

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मिली बीमारी से मुक्ति और प्रमोशन की युक्ति

डॉक्टर द्वारा मुझे हलका हार्टअटैक आया बताने पर मैं आगरा में आई.सी.यू. में भर्ती हो गया और 39 दिन की छुट्टी लेनी पड़ी, जिसके कारण मैं हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित मापदंड के अनुसार वार्षिक कार्य नहीं कर पाया। तत्कालीन जिला जज ने असंतुष्ट होकर मेरी गोपनीय चरित्रावली खराब कर दी और मैं मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट से अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद पर पदोन्नति से वंचित हो गया। मेरे एक भाई की हार्ट अटैक से मृत्यु हो चुकी है, जबकि 2 अन्य भाइयों की बाई पास सर्जरी हो चुकी है। उक्त परिस्थितियों में मैं मानसिक रूप से बहुत परेशान हो गया था। उसके कुछ समय बाद से मैं रोज प्रातः टी.वी. पर पूज्य गुरुदेव के प्रवचन सुनने लगा। वर्ष 2000 में मैंने गुरुपूर्णिमा महोत्सव पर भोपाल आकर दीक्षा ली।
डॉक्टरों ने मेरे पारिवारिक इतिहास को देखते हुए मुझे एन्जियोग्राफी कराने की सलाह दी किंतु मैं ऑपरेशन के नाम से ही भयभीत था। पूज्य गुरुदेव भी हृदयरोग के लिए सर्जरी के बदले अन्य उपचार समय-समय पर बताते रहते हैं इसलिए मैं बाईपास सर्जरी नहीं कराना चाहता था। एस्कार्ट हास्पिटल, दिल्ली के ऑपरेशन थियेटर में एन्जियोग्राफी के समय मैंने मन-ही-मन सदगुरूदेव को पुकारा और ऑपरेशन टालने की प्रार्थना की क्योंकि मुझे विश्वास था कि मुझे भी हृदयरोग है। जब एन्जियोग्राफी की रिपोर्ट आयी तो एक आर्टरी में मात्र 20 % रुकावट निकली, जो 45 वर्षीय व्यक्ति के लिए सामान्य बात है। सदगुरुदेव की कृपा से मेरा ऑपरेशन टल गया। मेरा रुका हुआ प्रमोशन भी अप्रत्याशित रूप से पूज्य गुरुदेव ने करवा दिया क्योंकि गुरुदेव की अमृतवाणी ने मुझमें इतना आत्मविश्वास भर दिया कि फिर मैंने अपना न्यायिक कार्य बहुत अच्छी श्रेणी का करके दिखाया। मुझे दो अच्छी गोपनीय चरित्रावली की आवश्यकता थी और जो प्रमोशन मीटिंग 1 वर्ष पहले होने वाली थी, वह गुरुदेव की कृपा से टल गयी। अतः जब मीटिंग हुई तब तक मुझे दो अच्छी ‘सी.आर.’ मिल चुकी थी। इस प्रकार पूज्य गुरुदेव में आस्था रखने के कारण मुझे न केवल बीमारी से मुक्ति मिली बल्कि प्रमोशन के नुकसान की भी भरपाई हो गयी। परम पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से अब मन शांत रहता है और सांसारिक हानि-लाभ ज्यादा प्रभावित नहीं करते हैं। सदगुरुदेव की कृपा का मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

के.पी.सिंह
(अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश)
सोनकच्छ जिला देवास (मध्य प्रदेश)
ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2006, पृष्ठ संख्या 31, अंक 167

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