भूले भटकों को दिखाये राहः ‘ऋषि प्रसाद’

मैं ऋषि प्रसाद का सदस्य हूँ। इस पत्रिका का सदस्य बनने से पहले मेरा जीवन बड़ा घृणित था।बुरी संगत में आकर मैंने अपना यौवनरूपी धन व्यर्थ बहा दिया। इसमें केवल मेरा ही दोष नहीं है बल्कि आज का प्रदूषित वातावरण ही ऐसा है कि जिसमें युवावर्ग अक्सर भटक जाता है। युवावर्ग को उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। ऋषि प्रसाद में आने वाले ‘युवा जागृति संदेश’ शीर्षक लेख से प्रभावित होकर मैंने ब्रह्मचर्य पालन करने का निर्णय ले लिया है। अब मैं प्रतिदिन सुबह-शाम रामनाम जपता हूँ। आपके द्वारा प्रकाशित ऋषि प्रसाद पत्रिका देश में असंख्य भूले भटके व्यक्तियों को सही रास्ते पर लाने का कार्य सरलता से करती है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है।

विजय ‘स्टार’, रणवां की ढाणी, चूरू (राजस्थान)

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 31, सितम्बर 2002, अंक 117

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