Archive | January 2013

‘बाल संस्कार’ पुस्तक से….

मेरा नाम ऐशवर्य तिवारी है। मैं कक्षा चार का छात्र हूँ। मेरी माँ पूज्य बापू जी द्वारा दीक्षित है। उसने मुझे आश्रम से प्रकाशित पुस्तक बाल संस्कार पढ़ने को दी। उसमें लिखे प्रयोग करने से मेरी स्मरणशक्ति बढ़ी है। पहले मैंने पहली कक्षा में 78 % , दूसरी में 80 % अंक प्राप्त किये थे, परंतु अब गुरुदेव की कृपा से तीसरी कक्षा में 90 % अंक प्राप्त किये।

ऐश्वर्य तिवारी
ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2003, पृष्ठ संख्या 29, अंक 131

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ब्लड कैंसर गायब !

हमारे मित्र की लड़की मुंबई में 9वीं कक्षा में पढ़ती थी। 2001 अप्रैल में उसे ब्लड कैंसर हो गया था। गरीब घर की इकलौती लड़की…. तभी बापू जी ने सोनी चैनल पर अपने सत्संग में तुलसी रस व शहद की चमत्कारिक दवा बतायी। हमने तुरंत उसकी माँ को फोन करके यह दवा बता दी। उन्होंने उसी दिन से तुलसी का रस और शहद एवं ज्वारे का रस देना शुरु कर दिया और कुछ ही दिनों में वह ठीक हो गयी। अब वह एकदम स्वस्थ है एवं खेलकूद में उसने पूरे भारत में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है।

कैसी है बापू जी की कृपा !

आशा वर्मा
504, आनंद विहार, मुंबई (महाराष्ट्र)
ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 30, अंक 122, फरवरी 2003.

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ब्लड कैंसर से मुक्ति

जनवरी 2002 में मेरे बड़े पुत्र को बुखार आया था। डॉक्टरों को दिखाया था तो किसी ने मलेरिया कहकर दवाइयाँ दीं तो किसी ने टायफाईड कहकर इलाज शुरु किया। दवा लेने से शरीर नीला पड़ गया और सूज गया। शरीर में खून की कमी होने से छः बोतलें खून चढ़ाया गया। इंजेक्शन देने से पूरे शरीर को लकवा मार गया। पीठ और पेट का एक्स रे लिया गया। डॉक्टरों ने उसे वायु का बुखार तथा रक्त का कैंसर बताया और कहा कि उसके हृदय का वाल्व चौड़ा हो गया है। ज्यों-ज्यों इलाज किये, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ा दिया। यह है अंग्रेजी दवाओं और इंजेक्शनों का काला मुँह ! फिर भी हम चेतते नहीं। अब हम हिम्मत हार गये। गुरु जी के सिवाय कोई सहारा नहीं था। हमने पूज्य श्री की कुटिया की परिक्रमा की एवं श्री आसारामायण का पाठ किया। गुरुजी की करुणा-कृपा बरसी और 18 दिनों में ही मेरा पुत्र चलने फिरने लगा। अब वह पूर्णतया ठीक हो चुका है। मैं उन महापुरुष की जीवनगाथा को बार-बार नमन करता हूँ,जिसके श्रद्धा-संयुक्त पाठ से मेरे पुत्र को जीवनदान मिल सका और भक्त भाइयों से प्रार्थना करता हूँ कि वे नित्य इसका मंगलमय पाठ किया करें।

एन.डी.चावला
प्रसिद्ध उद्योगपति
सेक्टर 35, चण्डीगढ़

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ 30, अंक 133, जनवरी 2004

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भूले भटकों को दिखाये राहः ‘ऋषि प्रसाद’

मैं ऋषि प्रसाद का सदस्य हूँ। इस पत्रिका का सदस्य बनने से पहले मेरा जीवन बड़ा घृणित था।बुरी संगत में आकर मैंने अपना यौवनरूपी धन व्यर्थ बहा दिया। इसमें केवल मेरा ही दोष नहीं है बल्कि आज का प्रदूषित वातावरण ही ऐसा है कि जिसमें युवावर्ग अक्सर भटक जाता है। युवावर्ग को उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। ऋषि प्रसाद में आने वाले ‘युवा जागृति संदेश’ शीर्षक लेख से प्रभावित होकर मैंने ब्रह्मचर्य पालन करने का निर्णय ले लिया है। अब मैं प्रतिदिन सुबह-शाम रामनाम जपता हूँ। आपके द्वारा प्रकाशित ऋषि प्रसाद पत्रिका देश में असंख्य भूले भटके व्यक्तियों को सही रास्ते पर लाने का कार्य सरलता से करती है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है।

विजय ‘स्टार’, रणवां की ढाणी, चूरू (राजस्थान)

ऋषि प्रसाद, पृष्ठ संख्या 31, सितम्बर 2002, अंक 117

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