Archive | July 2012

मौत के मुख से वापसी

परम पूज्य सदगुरुदेव से मेरा पूरा परिवार दीक्षित है। 15 अप्रैल, 1994 की घटना हैः

मेरी माँ तीसरी मंजिल से उतरकर कपड़े धोने के लिए नीचे गई। उसके शरीर में एकाएक कम्पन होने लगा और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। फिर उसी हालत में न जाने कैसे तीसरी मंजिल की बालकनी में आई और वहीं पर धड़ाम से गिर पड़ी। उसके गिरने की आवाज सुनकर हम सभी वहाँ पहुँचे तो देखा कि उसका मुँह टेढ़ा होता जा रहा है। कुछ क्षण बाद वह बेहोश हो गयी। उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया। डॉक्टरों ने कहा कि सिर की नस फट गई है और दायें सिर से लेकर दायें पाँव की एड़ी तक लकवा (पैरालीसिस) मार गया है। इनका बच पाना मुश्किल है। तीन दिन तक हम कुछ नहीं कह सकते। घटना के दूसरे दिन मैं और मेरी बहन दोनों पूज्य बापू के आश्रम में पहुँचे। पूज्य श्री उस समय वहाँ नहीं थे तो मेरी बहन ने पूज्य माता जी को पूरी घटना बतायी। पूज्य माता जी ने कहाः
“बड़ बादशाह की परिक्रमा करो, वहाँ का जल पिलाओ, श्रीगुरुगीता का पाठ करके पानी में निहारते हुए स्वास्थ्य मंत्र का जप करो और उस पानी को पिला दो। सब ठीक हो जायेगा।”

….और हुआ भी ऐसा ही। मेरी माँ आज भी ठीक ढंग से हँसती, बोलती व चलती है। डॉक्टर लोग यह देखकर दंग रह गये ! यह पूज्य गुरुदेव की करुणा-कृपा का ही फल है।
मेरी माँ ने ठीक होने के बाद बतायाः
“जब मेरे सिर में चक्कर आने लगा व आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा तो अचानक मुझे पूज्य
बापू का स्मरण हो आया और मैं गुरुमंत्र जपने लगी। फिर मैंने देखा कि श्वेत वस्त्रधारी दो दिव्य पुरुष मेरा हाथ पकड़कर तीसरी मंजिल की बालकनी तक छोड़ने के लिए ले जा रहे है। उसके बाद क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं। जब मैं अस्पताल में थी तो पूज्य बापू खिड़की में मंद-मंद मुस्कराते हुए दिखे। फिर गहरी नींद में चली गयी तो पूज्य श्री मुझे कभी सत्संग करते दिखते, तो कभी हँसते-मुस्कराते व झूमते हुए दिखाई देते। डॉक्टरों में भी मुझे पूज्य श्री ही दिखाई देते। पूज्य गुरुदेव की कृपा से मुझे नई जिन्दगी मिली है। धन्य हैं गुरुदेव ! आप धन्य हैं !!”

‘सभी शिष्य रक्षा पाते हैं, सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं….’ यह बात इस घटना से सिद्ध होती है।

संजय एस. शर्मा
सी-26, रम्याकुंज सोसायटी, जलधारा सोसायटी के पास,
इसनापुर वटवा रोड, इसनपुर, अमदावाद
ऋषि प्रसाद, अंक 78, पृष्ठ संख्या 28, जून 1999

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मौत के मुख से वापसी

29 सितम्बर 1999 को सुबह नौ बजे हम चार लड़के बोर्ड का फार्म भरने के लिए दो होण्डा मोटरसाइकिल पर सवार होकर भीलवाड़ा से अजमेर के लिए निकल पड़े। मैंने श्री आसारामायण का मौखिक पाठ आरम्भ कर दिया। पाठ लगभग पूरा होने को था और हम भीलवाड़ा से 60 कि.मी. दूर निकल चुके थे। हमें 70 कि.मी. और चलना ही था कि हम हाइवे पर जिस ट्रक को दाहिने तरफ से पार कर रहे थे वह उसी तरफ मुड़ गया और हमारा एक्सीडेंट हो गया। एक्सीडेंट इतना खतरनाक था कि हमारी पूरी गाड़ी बिखर गई और उसी समय हमें ऐसा लगा कि जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने हमें बाहर उछाल फेंका हो। हम मौत के मुँह में जाकर भी वापस जिंदा आ गये। हम दोनों को उस वक्त साधारण चोटें आईं, दोनों के बाएँ हाथ में फ्रैक्चर हो गये। जब हम ट्रक के नीचे से जिंदा निकले तो लोग आश्चर्य कर रहे थे और हम दोनों उस अदृश्य शक्ति श्री सदगुरुदेव को मन-ही-मन प्रणाम कर रहे थे।

लाटूलाल वर्मा
गायश्री नगर, भीलवाड़ा
ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 29, अंक 102

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मौत के मुख से सकुशल वापसी

आज तक तो साधकों के मुख से ही सुना था कि श्री आसारामायण का पाठ करने वाले साधकों की रक्षा स्वयं पूज्य श्री करते हैं परन्तु गत दिनों मेरे जीवन में भी ऐसा प्रसंग आया कि उन अनुभव संपन्न साधकों में मैं भी शरीक हो गया। घटना 17 सितम्बर 1996 की है। मैं दिल्ली से करीब 1.30 बजे दिन को हरियाणा रोडवेज़ की बस से जयपुर के लिए रवाना हुआ। जैसे ही बस दिल्ली से बाहर निकली, मैंने श्री आसारामायण का पाठ आरंभ कर दिया लेकिन कितनी ही बार पाठ बीच-बीच में खण्डित होने लगा। एक ओर जैसे कोई मुझे पाठ करने में विघ्न पैदा कर रहा था तो मानो दूसरी ओर कोई मुझमें सतत पाठ कराने की प्रेरणाशक्ति का संचार कर रहा था। यह सब क्या हो रहा था? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जैसे ही पाठ पूर्ण हुआ, मैं निश्चिन्त हो खिड़की के सहारे टिककर सोने की कोशिश कर रहा था कि यकायक मैं जिस ओर बैठा था उस ओर की सभी खिड़कियों के शीशे टूटने शुरु हो गये और बस जो कि 60-70 कि.मी. की गति से भाग रही थी, संतुलन बिगड़ जाने से सड़क के नीचे उतर गई और लगा कि बस अब पलटने वाली ही है। बस में कोहराम मच गया। सभी यात्रियों ने अपनी जान बचाने के लिए अगली सीट के पाईप पकड़ रखे थे। बस के असंतुलन की दशा को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे सभी मौत के मुख में प्रवेश कर चुके हैं। यद्यपि बस में सर्वत्र जोर जोर से चीखें आ रही थी, किन्तु मेरे मुख से स्वाभाविक ही ‘गुरुदेव… गुरुदेव…’ निकलने लगा। मानो मेरे भीतर से कोई इस संकट की घड़ी से उबारने के लिए गुरुदेव को पुकार रहा था। मैंने देखा कि सामने एक बबूल का बड़ा पेड़ है बस उससे टकराकर चकनाचूर होने ही वाली है। मैंने आँखें बन्द कर लीं और हृदयपूर्वक पूज्यश्री को पुनः पुकारा। बस, फिर तो मानो चमत्कार हो गया !

श्री आसारामायण की इन पावन पंक्तियों का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया।

सभी शिष्य रक्षा पाते हैं।

सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।

धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते।

आपद रोगों से बच जाते।।

मैं क्या देखता हूँ कि बस उसी क्षण बबूल के पेड़ के पास खड्डे में धंस जाने से रुक गई और मुझे तो क्या, बस में सवार किसी भी यात्री का बाल भी बाँका नहीं हुआ। सभी यात्रियों को पूज्यश्री की असीम अनुकंपा से एक नया जीवन मिल गया। मुझे आज पता चला कि किस तरह हृदयपूर्वक पुकारने से गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से आकर शिष्यों की तो क्या, सभी की रक्षा करते हैं हम भले ही गुरुदेव को शिष्य- अशिष्य की परिधि में अपनी मानवीय बुद्धि से बाँधें लेकिन वे तो पूरे विश्व के गुरु हैं। सचमुच, पूरी मानव जाति पूज्य श्री को पाकर कृतार्थ हो चुकी है।

महेन्द्रपाल गौरी,
डिप्टी मैनेजर
एच.एम.टी.लि., अजमेर (राजस्थान)

ऋषि प्रसाद, अंक 48, पृष्ठ संख्या 20, दिसम्बर 1996

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ये कैसा है जादू !

मई 1994 में मुझे किडनी की तकलीफ हो गयी थी। डॉक्टरों ने बताया कि ‘आपकी एक किडनी जन्म से ही खराब है और दूसरी भी 22 साल तक अकेले ही काम करने के कारण खराब हो चुकी है। दोनों किडनियों में हाइड्रोनेफ्रोसिस की बीमारी है और पथरी भी है। आपको ऑपरेशन कराना पड़ेगा।’ उन्हीं दिनों में पूज्य गुरुदेव का मुंबई में सत्संग आयोजित हुआ। मैंने पूज्य बापू जी से दीक्षा ले ली। दीक्षा के दिन ही पूज्य गुरुदेव जी ने मुझ पर कृपा बरसाते हुए पूछा कि “तुझे क्या हुआ है।” मैंने रोते-रोते अपनी किडनी की तकलीफ की बात बतायी और कहा कि “इस तरह का रोग ठीक होना मुश्किल है – ऐसा डॉक्टर कहते हैं।”
पूज्य गुरुदेव ने अपनी नूरानी नज़र से कृपा बरसाते हुए मुझे मंत्र दिया और कहा कि तुझे कुछ नहीं होगा। इस बात को आज ग्यारह साल से भी अधिक समय हो गया है। अभी मैंने दिनांक 20.7.2005 को के.ई.एम. हॉस्पिटल (परेल, मुंबई) से किडनी के सब टेस्ट करवाये तो मुझे बताया गया कि दोनों किडनियों में आज भी खराबी है, फिर भी 100 % काम कर रही हैं। इस अवस्था में रोगी को कभी डायलसिस पर जाना पड़ता है परंतु आज तक मुझे सिर दर्द या बुखार ने भी नहीं सताया। मैं गुरुदेव की कृपा से बिल्कुल स्वस्थ जीवन जी रही हूँ। यह विज्ञान-जगत के लिए अत्यंत आश्चर्य की बात है।

श्रीमति मंजुला हरेश भानुशली
सी-203, साईंधाम सोसायटी, मुलुंड, पश्चिम, मुंबई, महाराष्ट्र
फोनः 25688929
ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2005, पृष्ठ संख्या 27, अंक 153

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‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक ने बदला मेरा जीवन !

बचपन से ही पूजा पाठ में मेरी रूचि थी किंतु 14-15 वर्ष की उम्र में मैं कुसंगी हो गया और अज्ञानतावश गंदी आदतों वाले मित्रों का संग करने लगा। उन्होंने मुझे हस्तमैथुन करना सिखा दिया। किसी लड़की को देखते ही मेरा मन काम-विकार से भर जाता और मैं एकांत स्थान खोजने लगता। मैं दिन में 3-4 बार वीर्यनाश करता था। किंतु तब भी पूजा पाठ का मेरा नियम नहीं टूटा, उसे मैं नियमित रूप से करता रहा। वीर्यनाश से मैं कमजोर हो गया। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा और थोड़े से परिश्रम से ही मैं हाँफने लगता था। कभी-कभी अधिक कमजोरी से मूर्च्छा भी आ जाती थी। मेरी संकल्पशक्ति भी कमजोर हो गयी थी। मेरा क्रोध भी अत्यधिक बढ़ गया था। माता-पिता हित की बात बताते किंतु मैं उसे नहीं मानता था और माता पिता के ऊपर नाराज होकर उन्हें उल्टा जवाब भी दे देता था। आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘यौवन सुरक्षा’ ने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी ! मेरी वह गंदी आदत छूट गयी। मुझे आज तक ऐसी बातें किस पुस्तक में पढ़ने को नहीं मिली। मैं इस पुस्तक को लोगों तक पहुँचाने वालों को नमन करता हू।

मैं भी इस पुस्तक को कॉलेजों में तथा गाँवों में पहुँचाने का प्रयास करूँगा। प्यारे गुरुवर को शत-
शत प्रणाम हैं, जिनकी कृपा से मेरी गंदी आदत छूट गयी।

सत्यप्रकाश मिश्र (कक्षा 10वीं)

ग्राम-कैल केशवपुर

पोस्ट-भरतकुंड, फैजाबाद (उत्तर प्रदेश)

ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2003, पृष्ठ संख्या 31, अंक 132

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रंगवर्षा द्वारा बरसी गुरू कृपा

मेरा नाम ममता सिंह है। मेरे पति आई.एस.आर.ओ. (इंडियन स्पेस रिसर्च ओर्गेनाइजेशन) में वैज्ञानिक हैं। मेरा बच्चा गौरव साढ़े छः साल का है। उसके पित्ताशय (गाल ब्लैडर) में पथरी थी। मैंने एक से एक डॉक्टर को दिखाया पर सभी ने बोला कि इसके पित्ताशय की थैली को ऑपरेशन के द्वारा निकालना पड़ेगा। मैं इस बात से परेशान थी। अंत में भोपाल मेमोरियल अस्पताल में एक डॉक्टर से मिली, जिन्होंने बोला कि तुरंत भर्ती करो, अभी ऑपरेशन करेंगे वरना समस्या आ सकती है। मैंने दीक्षा नहीं ली थी परंतु एक डेढ़ साल से बापू जी को मानती थी। अचानक मुझे भीतर से प्रेरणा हुई कि बापू जी के होली शिविर में सूरत जायें। मैं अपने बच्चे गौरव व पति के साथ होली शिविर में पहुँची और वहाँ हमने दीक्षा ली। बापू जी के हाथों से रंगवर्षा का लाभ भी मिला। उसके बाद जो घटना घटी उससे सिद्ध हुआ कि उस रंगवर्षा द्वारा गुरू कृपा ही हम पर बरस गयी थी। हम लोग वापस भोपाल आये और सोनोग्राफी करवायी तो पित्ताशय में कुछ भी नहीं मिला, पथरी गायब हो गयी थी। मेरा बेटा बिल्कुल ठीक हो गया। मेरे पास शब्द नहीं हैं जो मैं अपनी प्रसन्नता को व्यक्त कर सकूँ। बस इतना कहना चाहती हूँ-

जो शरण गुरू की आया,

इहलोक सुखी परलोक सुखी।

ममता सिंह

अयोध्या नगर, भोपाल (मध्य प्रदेश)

मोबाइल नं. 9425674349.

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2009, अंक 197, पृष्ठ संख्या 27

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लापता बहन मिली

10 अप्रैल 1999 को मेरी छोटी बहन घर से बिना बताये अचानक लापता हो गई। मैंने अमदाबाद आश्रम के पते पर बापू जी को पत्र लिखा किन्तु बापू जी वहाँ नहीं थे। मैंने अपनी जप संख्या बढ़ा दी। इस तरह सवातीन महीने बीत गये और इस दरमियान हम लोगों ने खूब रुपये खर्च कर डाले। मेरे घरवालों ने 1000 रुपयों की और व्यवस्था की एवं कहाः “बापू जी के पास निकल जा इसी समय।” रायपुर आश्रम से पता चला कि बापू जी गुरुपूनम के अवसर पर इन्दौर के लिए निकल पड़ा। दूसरे दिन इन्दौर पहुँचा और तभी से मैंने बापू जी से मिलने के पाँच-सात बार प्रयास किया किन्तु असफल रहा। मैंने दृढ़ संकल्प किया था कि बापू जी से मुलाकात करके ही जाऊँगा, अन्यथा नहीं जाऊँगा। 20 जुलाई 1999 को बापू जी का अंतिम सत्संग दिवस था। बापू जी दोपहर बारह बजे दिल्ली के लिए रवाना होने वाले थे। मैंने अपनी बहन की फोटो हाथ में पकड़कर पूज्य श्री को दूर से ही दिखा दी और बताया किः “बापू जी ! यह मेरी छोटी बहन है जो कुँवारी है पिछले साढ़े तीन महीने से लापता है।” तभी मेरे परम पूज्य बापू जी ने दाहिने हाथ में एक सेवफल लेकर फोटो को मारा। मैं खुशी-खुशी घर आया और उसी रात को मेरी बहन का पता लग गया। ठीक एक सप्ताह बाद मेरी बहन अकेली सकुशल वापस आ गई। ऐसे हैं मेरे सदगुरु ! परम पूज्य बापू जी को हमारे घर-परिवार की ओर से शत-शत नमन !

मुकेश कुमार दुबे

ग्राम पोस्टः तुमगाँव, जिला महासमुन्द (मध्य प्रदेश)

ऋषि प्रसाद, अंक 87, पृष्ठ संख्या 30, मार्च 2000

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