Archive | June 2012

स्थायी शांति व आनंद मिला

साल भर से ज्यादा समय से ‘आस्था इंटरनेशनल’ पर प्रतिदिन शाम में एकाग्र मन से बापू जी

का सत्संग सुनता हूँ और उसका जितना बन सके उतना अमल भी करता हूँ। किसी कारणवश शाम को

यदि घर पर न रहूँ, तब विडियो टेप लगाकर जाता हूँ। रात को ‘संस्कार चैनल’ पर सत्संग सुनने के बाद

सोता हूँ। इससे मुझे बहुत लाभ होता है।

मैंने तीनों देवों ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जगदंबाजी और गणेषजी की 30 वर्षों में 35 यात्राएँ कीं। 4

वेदों सहित सभी शास्त्रों, पुराणों का स्वाध्याय किया और श्रवण भी किया लेकिन उसके द्वारा प्राप्त

आनंद और शांति मन में हमेशा के लिए स्थान प्राप्त न कर पाये। पूज्य बापू जी के सत्संग सान्निध्य

ने मुझे स्थायी शांति और आनंद प्रदान किया है। बापू जी के आशीर्वाद से मुझे दिव्य अनुभूतियाँ हुई हैं

और दिन रात मैं बापू जी से प्राप्त सकारात्मक शक्ति का अनुभव करता हूँ। इसी शक्ति से दिन का हर

पल बिताता हूँ।

मुसीबत के समय में बापू जी सपनों में दर्शन देकर हृदय में वह रोशनी देते हैं, जिससे संकट का

समाधान प्राप्त होता है। बापूजी के आशीर्वाद ने मुझ पर वायु की गति से परिणाम किया है।

बापू जी ! आप इस दशक के चलते-फिरते साक्षात् आत्मास्वरूप भगवान हैं, जिन्होंने अगणित

मनुष्यों की नैया को संसाररूपी भवसागर के पार लगा दिया है।

जीतुभाई जवेरी, मुंबई संपर्कः 9323130365

ऋषि प्रसाद, जून 2006, पृष्ठ संख्या 31

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स्वप्न में मंत्रदीक्षा

मुझे आज से 5-7 वर्ष पूर्व पंचेड़ (रतलाम) आश्रम पर पूज्यश्री द्वारा मंत्रदीक्षा मिली

थी परन्तु उस समय मुझे इस अति अनमोल धरोहर के महत्त्व का पता नहीं होने से मैं पता नहीं कैसे,

अपना गुरुमंत्र भूल गया। मुझे कभी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ? गुरुमंत्र गुप्त होता है

इसलिए मुझे बताने वाला भी कोई नहीं था। मुझमें इतनी हिम्मत भी नहीं कि मैं अपनी इस भारी भूल

का पूज्यश्री के समक्ष दोहरा सकूँ। ऐसा लगा कि मैंने अपने जीवन का सर्वस्व खो दिया है। मेरे पास

सिवाय पश्चाताप के कोई शेष मार्ग नहीं था। फिर भी मुझे पूज्यश्री की निशदिन हम बच्चों पर बरसती

कृपा पर अटूट विश्वास था।

मैंने मन-ही-मन प्रतिदिन पूज्यश्री से प्रार्थना करना आरंभ किया। मुझे पूरा यकीन था कि

जब करुणासिंधु गुरुवर सभी की संसारी इच्छाएँ पूर्ण करने में कोई कमी नहीं रखते, किसी को निराश नहीं

करते तो मैंर जो उनसे माँग रही हूँ वह तो परम दुर्लभ प्रसाद है। बस… दिन रात प्रार्थना, पश्चाताप

में खोयी रहती। आखिरकार पूज्यश्री ने मेरी बिनती स्वीकार कर ली। मेरे निराश, दुःखी मन-मंदिर में

गुरुकृपा से आनंद और प्रभुभक्ति के दीप जगमगाये। एक रात्रि को पूज्यश्री ने स्वप्न में दर्शन दिये

और प्रेम से आँख दिखाते हुए उसी सहज मनोहारी शैली में मुझसे पूछाः “तेरा गुरुमंत्र क्या है ?”

मैं कुछ कहने का साहस नहीं कर पायी। तब पूज्यश्री ने मुझे अपना वही गुरुमंत्र स्मरण कराते

हुए कहाः “यही है न तेरा मंत्र ?

इतना सुनते ही मुझे अपना वही गुरुमंत्र पुनः स्मरण आ गया और मेरी खुशी का कोई दौर नहीं

रहा। पूज्यश्री मुस्कराये और बोलेः “बेटा ! अब मत भूलना।”

मेरे हृदय में उस समय इतनी अत्यधिक खुशी हुई कि बरबस मेरी नींद खुल गयी औऱ मेरी आँखें

भर आयीं। सचमुच, पूज्य श्री कितने कृपालु हैं ! हम भक्तों पर कैसे-कैसे, किस रूप में कब और कहाँ-कहाँ

अपनी कृपा करते हैं इसको आँक पाना अत्यंत दुष्कर है। मुझे ऐसा लगा जैसे मेरा फिर से एक नया जन्म

हुआ। अब मैं प्रतिदिन उसी उत्साह, तत्परता और नियमपूर्वक अपनी साधना करती हूँ।

पूज्यश्री के श्रीचरणों में मेरा कोटिशः नमन….

श्रीमती मनुबहन सोनी

दौलतगंज, रतलाम (मध्य प्रदेश)

ऋषि प्रसाद, अंक 52, पृष्ठ संख्या 29, अप्रैल 1997

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हरि नाम की प्याली ने छुड़ाई शराब की बोतल

सौभाग्यवश, गत 26 दिसम्बर 1998 को पूज्य श्री के 16 शिष्यों की एक टोली दिल्ली से हमारे

गाँव में हरि नाम का प्रचार-प्रसार करने पहुँची।

मैं बचपने से ही मदिरापान, धूम्रपान व शिकार करने का शौकीन था। पूज्य बापू की शिष्यों द्वारा

हमारे गाँव में जगह-जगह पर तीन दिन तक लगातार हरि नाम का कीर्तन करने से मुझे हरि नाम का रंग

लगता जा रहा था।

उनके जाने के पश्चात् एक दिन शाम के समय रोज की भाँति मैंने शराब की बोतल निकाली तथा

जैसे ही बोतल खोलने के लिए उसका ढक्कन घुमाया तो उस ढक्कन के घूमने से मुझे हरि ॐ… हरि ॐ की

ध्वनि सुनाई दी। इस प्रकार मैंने दो तीन बार ढक्कन घुमाया और हर बार मुझे हरि ॐ की ध्वनि सुनाई

दी।

कुछ देर बाद मैं उठा तथा पूज्य श्री के एक शिष्य के घर गया। उन्होंने थोड़ी देर मुझे पूज्य श्री

की अमृतवाणी सुनाई। अमृतवाणी सुनने के पश्चात् मेरा हृदय पुकारने लगा कि इन दुर्व्यसनों को त्याग

दूँ। मैंने तुरन्त बोतल उठाई तथा जोर से दूर खेत में फेंक दी।

ऐसे समर्थ व परम कृपालु सदगुरुदेव को मैं हृदय से प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से यह

महत्त्वपूर्ण घटना मेरे साथ घटी तथा मेरा जीवन परिवर्तित हुआ।

मोहन सिंह बिष्ट

भिख्यासैन, अल्मोड़ा (उत्तर प्रदेश)

ऋषि प्रसाद, अंक 110, पृष्ठ संख्या 30, फरवरी 2002

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हृदय की पुकार सुनते हैं हमारे बापू जी

पूज्य बापू जी के श्रीचरणों में प्रणाम !

हमारी कंपनी ने एक महीने पूर्व दिल्ली शाखा के सभी 50 कर्मचारियों को 2 अप्रैल 2009

से देहरादून ट्रान्सफर का नोटिस जारी कर दिया था। इसी बीच बुराड़ी, दिल्ली में 9 व 10 अप्रैल को

आयोजित बापू जी के सत्संग की घोषणा हो गयी। आपकी कृपा से मुझे उसमें सत्संगियों को सत्संग

स्थल का मार्गदर्शन करने की सेवा मिल गयी। मैंने मन ही मन बापू जी से प्रार्थना की और

अधिकारियों का मन पलटा।

सभी कर्मचारियों को 2 अप्रैल को देहरादून डयूटी पर जाना था पर 1 अप्रैल को कंपनी के मुख्य

अधिकारियों एवं मालिक ने सभी कर्मचारियों को बुलाकर अपने निर्णय को कुछ समय तक स्थगित कर

दिया। सभी कर्मचारी अति हर्षित हैं। मुझे उनसे भी अधिक हर्ष है क्योंकि गुरू कृपा ने मुझे सत्संगियों

की सेवा के अवसर से वंचित होने से बचा लिया। हम सबकी तरफ से आपको कोटि-कोटि प्रणाम !

विजय साहनी,

क्यू यू 10 सी, पीतमपुरा, दिल्ली-88

मो. 9310695701, 9868637066

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2009, अंक 197, पृष्ठ संख्या 27

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दीक्षा से मिली नयी जीवन-दिशा

अंक १२३
मार्च २००३
दीक्षा से मिली नयी जीवन-दिशा
फिल्में देखने के कारण कुसंगत में पड़कर मैं दसवीं कक्षा से ही
जर्दा , गुटखा खाता था व बीड़ी सिगरेट तथा बियर आदि पीता था |
कॉलेज में जाने पर भी यह क्रम चालू रहा |
ह्स्तमुथैन जैसी घातक आदतों का भी में शिकार हो गया |
इस तरह ९ वर्षों तक जीवन पतन के गर्त में गिरता गया |
मेरे पहले के जीवन का सम्पूर्ण वर्णन में नहीं कर सकता |
वास्तव में आहार- विहार और शिष्टाचार विहीन जीवन जीता
हुआ मैं खुद को बड़ा आधुनिक एवं योग्य मानता था |

एक बार मैं अपने एक मित्र के कमरे पर गया |
सौभाग्य से वहां पर मुझे पूज्य बापूजी की दो पुस्तकें –
‘यौवन सुरक्षा’ व ‘तू गुलाब होकर महक’ मिल गयीं,
जिन्हें मैं मित्र से मांगकर पढ़ने के लिए ले आया |
उन्हें पढ़कर मेरे जीवन ने करवट ली, जीवन में एक प्रकाश हुआ |
मुझे अपने आचार, विचार और संस्कारहीन जीवन पर बड़ी ग्लानि हुई |
एक दिन में मित्र के साथ इंदौर में खण्डवा रोड, विलावली तालाब
पर स्थित आश्रम में गया | वहां से पूज्य बापूजी की बहुत-सी
पुस्तकें खरीद लाया |

बी. काम. पूरा होने पर मैं गाँव आया तो वहां सोनी टी.वी. पर
पूज्य बापूजी के सत्संग को प्रतिदिन नियम से सुनता था |
सत्संग सुनते रहने से मेरे ह्रदय में बापूजी से मंत्रदीक्षा लेने
की तीव्र इच्छा हुई |दिसम्बर १९९६ में सूरत आश्रम में आयोजित
‘ध्यान योग शिविर’ में दीक्षा लेने के बाद मेरी सारी गंदी आदतें
दूर हो गयीं | मैं सुबह- शाम नियमित रूप से गुरुमंत्र का जाप
करता रहा | मंत्रजाप से मेरी शारीरिक पेराशानियाँ व
मानसिक तनाव भी दूर हो गये |

सभी युवान- युवतियों से मेरी प्राथर्ना है कि आप भी बाह्य
आडम्बर युक्त, पत्नोंमुख , व्यसनी जीवन जी रहे हों तो
सावधान हो जायें | शिक्षा के साथ बापूजी जैसे
युवा- मनोविज्ञान के समर्थ आचर्य से दीक्षा लें |

जिनकी अमृतवाणी, साहित्य व मंत्रदीक्षा के प्रभाव से मेरे
जीवन को नयी दिशा मिली और वर्तमान
जीवन में सेवा व साधना का सुअवसर मिल रहा है,
ऐसे साक्षात् ब्रह्मस्वरूप सदगुरुदेव को कोटि कोटि
दंडवत प्रणाम….

ओमप्रकाश सीतारामजी खण्डेलवाल
सुदामा पुरी नसरुल्लागंज जिला सिहोर(म.प्र.)

ब्लड कैंसर गायब !

हमारे मित्र की लड़की मुंबई में ९ वीं कक्षा में पढ़ती थी |
२००१ अप्रैल में उसे ब्लड कैंसर हो गया था | गरीब घर की
इकलौती लड़की…..तभी बापूजी ने सोनी चैनल पर अपने
सत्संग में तुलसी-रस व शहद की चमत्कारिक दवा बतायी |
हमने तुरंत उसकी माँ को फोन करके यह दवा बता दी |
उन्होंने उसी दिन से तुलसी का रस और शहद एवं ज्वारे
का रस देना शुरू कर दिया और कुछ ही दिनों में वह ठीक हो गयी |
अब वह एकदम स्वस्थ है एवं खेलकूद में उसने पूरे भारत
में प्रथम पुरुस्कार प्राप्त किया है | कैसी है बापूजी की कृपा !

आशा वर्मा
५०४ आनंद विहार, मुंबई (महाराष्ट्र )

सत्संग के अपमान का परिणाम

अंक १०८
दिसम्बर २००१
सत्संग के अपमान का परिणाम
दिनांक : १ अगस्त २००१ को मेरे पास मोबाइल पर बार बार फोन आ रहा था |
उस समय मैं सत्संग- पंडाल में पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी का रसपान कर रहा था |
सत्संग के कारण मैं मोबाइल बंद कर देता था | उसके बाद आश्रम में मेरे लिए फोन
आया | वहां से उन्हें बताया गया कि मैं सत्संग में बैठा हूं, अभी बात नहीं हो सकती |
फिर उन्होंने पंडाल कार्यालय में भी फोन किया | वहां से भी यही उत्तर मिला |
अगले दिन उन्होंने (कैबिनेट गृह सचिव , भारत सरकार ) मोबाइल पर फोन करके
मुझ पर नाराज होते हुए और कहा : ‘आप मेरा नंबर देखकर भी मुझसे बात नहीं कर रहे थे |
’मैंने उनको समझाते हुए कहा : ‘में बापूजी का सत्संग सुन रहा था |’
तो वे बोले : क्या आप दो मिनट सत्संग छोड़कर मुझसे बात नहीं कर
सकते थे |’ मैंने कहा : ‘में अभी अवकाश पर हूं और सत्संग छोड़कर
आपसे बात नहीं कर सकता |’ तो वे बिगड़कर बोले : ‘सत्संग वत्संग क्या होता है ?
अभी दो मिनट में ट्रान्सफर हो जायेगा तो निकल जायेगा सत्संग वत्संग |’
इस घटना के करीब चार घंटे बाद मैंने एक अधिकारी को फोन करके कहा
मेरे साथ ऐसा हुआ है, आप उन्हें थोड़ा समझाएँ, तो उन्होंने बताया कि अभी
बात नहीं कर सकता, क्योंकि उनका शास्त्रीभवन के पास एक्सीडेंट हो गया है
और अभी वे साहब सफदरजंग हॉस्पिटल में भर्ती हैं | देखो, बड़े साहब मेरी
बदली करवाने की धमकी दे रहे थे, अब वे अपनी बदली घर से अस्पताल कर चुके थे |
सत्संग से क्या लाभ होता है इसे अगर हमारे अधिकारी व नेता समझ सकें तो
देश कितना समृद्ध और खुशहाल हो जाय और वे भी कितनी उन्नति करें |

श्री ए. के. सिंह (आई .ए.एस )
एस.डी.ऍम. (सब डिविजनल मजिस्ट्रेट )